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सोमवार, 6 अगस्त 2012

उलटा सीधा सा इक फ़लसफ़ा




आज एक सहकर्मी ने एक चित्र दिखाया जिस पर शब्दों के जाल को कुछ कमाल की तरह से बुना गया था । जिसे पढकर बरबस ही एक मुस्कान निकल जाती है । मामला एक युगल की नोंक झोंक और चुहल पर आधारित है , इसलिए सिर्फ़ इसलिए ही आपसे बांट रहा हूं ताकि आप भी मुस्कुरा उठें ,देखिए सगाई वाले दिन , दो प्रेमी युगलों के बीत की ये बातचीत :



प्रेमसुख :  इस दिन का तो मुझे कब से इंतज़ार था ,

चमेली : अच्छा तो मैं अब जाउं

प्रेमसुख : ना , बिल्कुल ना ।

चमेली : क्या तुम मुझसे प्यार करते हो ?

प्रेमसुख : हां , पहले भी करता था और आगे भी करता रहूंगा

चमेली : क्या तुम कभी मेरे साथ धोखा करोगे ?

प्रेमसुख : ना, इससे अच्छा तो ये होगा कि मैं मर ही जाऊं

चमेली : क्या तुम मुझसे हमेशा यूं ही प्यार करोगे ?

प्रेमसुख : हमेशा

चमेली : क्या तुम मुझे कभी मारोगे ?

प्रेमसुख : ना , मैं ऐसा आदमी नहीं हूं ।

चमेली : क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूं ?

प्रेमसुख : हां

चमेली : ..ओ हो डार्लिंग :)


पढ लिया न , अब सगाई के बाद की स्थिति के लिए इस पूरे वार्तालाप को उलटा यानि नीचे से ऊपर के क्रम में पढिए , माजरा साफ़ हो जाएगा

शुक्रवार, 18 मई 2012

दुर्बल बाबा की नज़रबंद किरपा







चौपटानंद जी इन दिनों काफ़ी परेशान चल रहे थे और होते भी क्यों नहीं बचपन से लेकर जवानी तक और जवानी से लेकर बडी जवानी तक , बुढापा नहीं , क्योंकि उनका फ़लसफ़ा था कि जब देश की संसद तक साठ साल में पहुंचने पर बूढी नहीं बल्कि परिपक्व और मजबूत कही जा रही है तो फ़िर वे तो अभी पचासे के पेटे में थे , तो इस बडी  जवानी तक उन्होंने दूसरों के चौपट होने में ही जीवन का आनंद पाया था । किंतु पिछले कुछ दिनों से अचानक उन्हें लगने लगा था कि उनकी गली , उनका मुहल्ला , शहर , राज्य का पूरा देश यकायक ही सुखी व समृद्ध हो गया है । और इसका पुख्ता कारण भी था उनके पास , अपने गुड , तेल की दुकान पर लगे टीवी पर उपलब्ध सभी चैनलों पर वे देख रहे थे कि एक और तीन आंख वाले दुर्बल बाबा के आगे देश के सारे भक्तगण बाबा की ही तरह सोफ़े पे पसरे फ़ुल्ल किरपा पा पा के निहाल हुए जा रहे थे ।  

हालांकि उन्होंने चैक करने के लिए बीच-बीच में कई विदेशी चैनलों पर भी किरपानिधान को तलाशा मगर वे समझ गए कि विश्व के बांकी सब देशों में क्यों महाप्रलय की बात चल रही है क्योंकि वहां किसी दुर्बल बाबा के किरपा की कोई छाया पडी ही नहीं । यहां वे थोडा तो जरूर भन्नाए , चकराए कि जिस देस में बाबा के त्रिनेत्र खुल गए हैं वहां तो मजे में मजा आ रहा है जबकि तीसरा नेत्र खुलने पर तो विनाश ही विनाश होता और जहां बाबे की पहली दूसरी आंख से काम चल रहा है वहां महाप्रलय , जय हो महाप्रभु -सचमुच ही घोर कलजुग आ गया था ।


चौपटानंद जी इसी चिंतन में सूख के हलकान हुए जा रहे थे कि इस रफ़्तार से अगर दुर्बल बाबा की फ़ुल्ल किरपा पूरे देश पर बरसती रही तो गरीबी कैसे बचेगी । और गरीबी नहीं बची तो गरीबी हटाने की योजनाएं कैसे बनेंगी , योजनाएं नहीं बनीं तो फ़िर सरकार कैसे चलेगी , देश कैसे चलेगा ? यानि कुल मिला के बाबा की किरपा के दूरगामी परिणामस्वरूप एक राष्ट्रीय संकट उत्पन्न हो सकता है । चौपटानंद जी की एक समस्या ये भी थी कि दुर्बल बाबा किरपानिधान और किरपा दोनों ,"एट योर डोर" वाली स्कीम के तहत खुद ही प्रोवाइड करा रहे थे । बाब ने किरपा और पिज़्ज़ा का सारा फ़र्क ही मानो मिटा के रख दिया था । द्वारे द्वारे नगरी नगरी प्रकट होकर और टहल टहल कर खुद ही  वे किरपा बरसा रहे थे , इस हिसाब से तो ये लोगों की आदत बिगाडने जैसा था , आखिरकार इत्ती फ़ैसिलिटि की आदत कहां है यहां के लोगों को ?


चौपटानंद जी ने तय कर लिया कि अब तो चाहे जो जो वे दुर्बल बाबा के साथ समागम करके ही मानेंगे , लेकिन छि: छि: समागम । लानत है , बाबा को कोई और नाम नहीं सूझा , मगर चलो अब किरपा करवानी है तो समागम ही सही । चौपटानंद जी फ़ुल्ल के लिए फ़ुल्ल तैयारी में जुट गए , फ़ूल , माला , धूप अगरबत्ते , मगर धत्त तेरे कि -किसी ने कहा- नसबंदी का इंतज़ाम करो पहले । नसबंदी - हैं ! चौपटानंद जी उछल गए । इस देश में अगर किरपा कराने के लिए पहले नसबंदी कराने की शर्त है तो फ़िर तो हो गया बेडा गर्क । देश की आबादी ऐसे ही चीन को कंपटीसन थोडी दे रही है , लेकिन फ़िर धत तेरे कि । नसबंदी नहीं - असल में वो दसबंदी क इंतज़ाम करने की बात थी ।



चौपटानंद जी पूरी तैयारी के साथ समागम में किरपा पाने को तैयार हो चुके थे अब । लेकिन ये क्या तत्काल ही सूचना मिली कि बाबा के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ हो गया है । अब इस बात के फ़ुल्ल फ़ुल्ल चांस बन गए थे कि बाबा अपने लिए सबसे पहले किरपा तलाश रहे हैं और दसबंद के चक्कर में नज़रबंद तक होने के पूरे पूरे आसार बनते नज़र आ रहे हैं । ओह! चौपटानंद जी सिर थाम कर किसी नए बाबा के अवतरित होने की प्रतीक्षा में लग गए

शनिवार, 30 जुलाई 2011

आपको क्या लगता है ...ब्लॉग की बकबक

आपको क्या लगता है ???


समाज में जिस तेज़ गति से बढते अपराधों की खबर , पढने , सुनने और देखने को मिल रही है , उससे मैं ठीक ठीक तय नहीं कर पा रहा हूं कि कौन किससे इंस्पायर हो रहा है , खबरों के अपराधप्रेम से अपराध बढ रहे हैं या बढते अपराध के कारण अपराध खबरों का दायरा बढ रहा है ....आपको क्या लगता है ??


जनलोकपाल बिल बनने न बनने जैसा ही जरूरी ये भी है कि आम लोगों में नागरिक संस्कारों को इतना विकसित किया जाए कि कम से सरेआम पिच्च की आदत , लाईन में खडे होने पर खिचपिच की आदत , और महिलाओं , बुजुर्गों , और अक्षम लोगों को बिना मांगे बैठने का स्थान न देने की आदत जैसी बातें बदलने का मन करने लगे , पहले खुद से फ़िर , बच्चों में इसे पैदा किया जा .........आपको क्या लगता है ???


दहेज जैसी प्रथा , और भारतीय शादियों में जबरदस्ती की फ़िज़ूलखर्ची करने की अब तो तेज़ी से फ़लती फ़ूलती परंपरा , को नहीं निभा सकने वाले मां बाप पर किसी पाप जैसा बोझ महसूस करने वालों और कराने वालों में वही एक ही मां बाप होते हैं ....................आपको क्या लगता है ????

आज बताइए कि आपको क्या लगता है ,,रविवार को यही बकबक सही 

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

आज यही सही ....






































कभी कभी कलम शब्द नहीं उकेरते कुछ और ही उकेर जाते हैं , मेरे साथ ऐसा बहुत कम होता है और अब तो न के बराबर ......तो आज यही सही

रविवार, 27 मार्च 2011

टिप्पणियों को टिकाइए जी .......इन्हें अलग से पाईए जी ...झा जी की बकबक




सिर्फ़ पोस्ट पर ही नहीं टिप्पणियों के लिए भी चले उंगलियां

हिंदी में जितना लेखन किया जा रहा है ..मतलब कि पोस्ट लेखन ..ऐसा हो सकता है कि उससे कहीं अधिक पठन किया जा रहा हो ..मगर यकीनन यहां बाहर से आए कई पाठकों को कई बहुत ही बेहतरीन पोस्टों पर पहुंचने पर जब एक भी टिप्पणी नहीं दिखाई देती तो वो ठिठक कर ये जरूर सोचता होगा कि आखिर इतने छोटे से हिंदी ब्लॉग जगत में भी जब ऐसी पोस्टों पर टिप्पणी नहीं है तो फ़िर इनके पाठक कहां हैं ? क्या ऐसी कुछ किया जा सकता है कि इन टिप्पणियों को ही एक जगह पर सहेजा जा सके ताकि उससे न सिर्फ़ उस पोस्ट बल्कि टिप्पणी का भी एक अलग वजूद बन जाए और शायद ऐसा करके बहुत से साथी ब्लॉगर्स को टिप्पणी करने के लिए प्रेरित किया जा सके ।


आज रविवार को यही बातें तब मेरे दिमाग में घूमती रहीं जब मैं पोस्टों को पढने के क्रम में इधर उधर टहल रहा था । मुझे लगता है कि हम इसलिए लिखते हैं क्योंकि अपने विचार बांट सकें और एक पोस्ट लेखक को यदि उस पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिलेगी तो न सिर्फ़ उस पोस्ट पर पहुंचने से ऐसा लगेगा जैसे आप किसी दीवार पर पहुंचे और वहां चस्पाई गई चीज़ पढ कर चुपचाप निकल गए हों । हां मैं मानता हूं कि न तो पोस्टें टिप्पणियों के लिए लिखी जाती हैं न ही हर पोस्ट पर प्रतिक्रिया की ही जाए ये जरूरी है , और इसके बावजूद कि शायद पोस्ट लेखक को उस लेख पर कोई प्रतिक्रिया अपेक्षित नहीं है ( हालांकि मुझे अब तक ऐसा कोई अपवाद मिला नहीं है , नहीं मैं नहीं मानता कि जिन्होंने टिप्पणी बक्सों को ताला लगा रखा है उन्हें किसी प्रतिक्रिया की दरकार नहीं है ) , लेकिब बाद में और बहुत बाद में आए पाठकों के मन बिना टिप्पणी वाली पोस्टों पर एक कौतूहल ये बना ही रह जाता है कि , आखिर इस पोस्ट को पढके क्या सोचा गया होगा । या शायद किसी ने इस पोस्ट को पढा ही नहीं ।


मैं ये सोच रहा हूं कि क्या ये संभव है कि हिंदी ब्लॉग पोस्टों पर की जा रही टिप्पणियों को एक मंच पर सहेज के रखा जा सके । विशुद्ध रूप से टिप्पणियों का एग्रीगेटर । हां मैं जानता हूं आप सोच रहे होंगे कि एक तो पहले से ही पोस्टों के लिए एक एग्रीगेटर के लाले पडे हुए हैं ऊपर से मैं टिप्पणियों के लिए एक अलग एग्रीगेटर की बात घुसेड रहा हूं । जी घुसेड ही नहीं दी है बल्कि ब्लॉगिंग महामानव ......ब्लॉग जिन्न ..श्री श्री बी एस पाबला जी के  इस नायाब मंच ..ब्लॉग मंच पर प्रश्न उछाल चुका हूं ...और इसका हल न निकले ..ऐसा हो ही नहीं सकता । ये तो बस बकबक थी जी ..क्या पता आगे आपके कौन सी काम आ जाए .....नहीं तो हम तो झाजी हैं ही ..बकबक वाले


बस आप लोग भी अब शुरू हो जाईये ..लीजीए ..एग्रीगेटर के लिए टिप्पणियां ही तो चाहिए न जी ..आयं